شکوه ها - سید عباس حسینی جوهری

شکوه ها
شاعر : سید عباس حسینی جوهری
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آه! از آن ساعت که با صد شور و شین |
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زینب آمد بر سر قبر حسین |
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بر سر قبر برادر چون رسید |
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ناله و آه و فغان از دل کشید |
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با زبان حال، آن دور از وطن |
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گفت با قبر برادر، این سخن: |
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السّلام! ای کشتهی راه خدا! |
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السّلام! ای نور چشم مصطفی! |
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السّلام! ای شاه بی غسل و کفن! |
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السّلام! ای کشتهی دور از وطن! |
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السّلام! ای تشنهی آب فرات! |
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السّلام! ای کشتی بحر نجات! |
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السّلام! ای سیّد و سالار ما! |
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السّلام! ای مونس و غمخوار ما! |
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بهر تو، امروز مهمان آمده |
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خواهرت از شام ویران آمده |
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سر بر آر از خاک و بنْگر حال ما |
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خیز از جا، بهر استقبال ما |
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شرح حال خود، حکایت میکنم |
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وز فراق تو، شکایت میکنم |
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تا تو بودی، شأن و شوکت داشتم |
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خیمه و خرگاه و عزّت داشتم |
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آتش کین، کوفیان افروختند |
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خیمهی ما را به آتش سوختند |
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الغرض؛ از کوفه تا شام خراب |
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گر چه ما دیدیم، ظلم بیحساب |
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لیک دارم شِکوهها از اهل شام |
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کز سر دیوار و از بالای بام، |
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آنقَدَر سنگ جفا بر ما زدند |
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کز غم، آتش بر دل زهرا زدند |
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از جفای شامیان، خون شد دلم |
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گشت در ویرانه آخر، منزلم |
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بگذر، ای «ذاکر»! ز شرح این مقال |
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تا توانی اندر این ماتم بنال |
گاهی گمــان نمـی کنـی و مـی شـود